भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम
(Indian Copyright Act)
भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम सन् 1957 में
पारित हुआ था जिसके तहत भारत में रचनाकारों, कलाकारों एवं सर्जकों की कापीराइट (प्रतिलिप्यधिकार या कृतिस्वाम्य) से
संबंधित सारे अधिकार निर्धारित एवं संचालित होते हैं। इसके पूर्व भारत में 1914 में कापीराइट अधिनियम बना था।
वह अधिनियम बहुत हद तक ब्रिटेन के 'इंपीरियल कापीराइट ऐक्ट (1911)' पर आधारित था। अंग्रेजों का यह कानून और उसके नियम भारतीय स्वाधीनता
अधिनियम के अनुच्छेद 18 (3) के अनुसार अनुकूलित कर लिए गए थे।
यही नियम 1957 तक चलते रहे। सन् 1957 में
नया कानून बनने पर पुराना कानून स्वत: निरस्त हो गया।
भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम (1957) के अमल में आने के बाद एक
प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय स्थापित किया जो इसी कार्य के लिये नियुक्त एक
रजिस्ट्रार के अधीन होता है। इस रजिस्ट्रार को केंद्रीय सरकार के नियंत्रण और
निर्देशन में काम करना होता है तथा उसके कई सहायक होते हैं। प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय
का मुख्य काम यह है कि वह एक रजिस्टर रखे जिसमें लेखक या रचनाकार के अनुरोध पर
रचना का नाम, रचनाकार या रचनाकारों के नाम, पते और कापीराइट जिसे हो उसके नाम, पते दर्ज किए
जाए।
प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय के साथ ही एक
प्रतिलिप्यधिकार मंडल (कापीराइट बोर्ड) की भी स्थापना की गई जिसका कार्यालय प्रमुख
भी रजिस्ट्रार ही होता है। इस मंडल को कई मामलों में दीवानी अदालतों के अधिकार
प्राप्त हैं। रजिस्ट्रार के आदेशों के विरोध में इस मंडल में अपील भी की जा सकती
है। प्रतिलिप्यधिकार मंडल का अध्यक्ष उच्च न्यायालय का जज, या सेवानिवृत्त जज हो सकता है
तथा उसको सहायता के लिए नियुक्त तीन व्यक्तियों की नियुक्ति की जाती है। तीनों
व्यक्तियों के लिए आवश्यक है कि वे साहित्य और कलाओं के जानकार हों। मंडल के
आदेशों के खिलाफ़ उच्च न्यायालय में अपील भी किया जा सकता है।
रचनाकार को प्रतिलिप्यधिकार उसके जीवन भर तथा उसकी मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी को 60 वर्ष तक प्राप्त रहेगा। यह अधिकार हस्तांतरित भी किया जा सकता है।
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